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सोमवार, 19 अप्रैल 2010


झूठी थाली में
बासी तन्हाई
सज़ा परोसी क्यूँ?

देखो ना अबके
तो मेरे गुनाह भी अजीब थे

"बुझे लबो पे मुस्कुराहटें "

4 टिप्‍पणियां:

दिलीप ने कहा…

waah sir kya chot ki seedhe dil pe...waah
http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

कुश ने कहा…

लबो पे मुसकुराहटे बूझना.. कितना कमाल का थोट है..

Shekhar Suman ने कहा…

bahut khub..
kayi bhaw samete huye..
yun hi likhe rahein...
regards..
http://i555.blogspot.com/

Shekhar Kumawat ने कहा…

bahut khub


shekhar kumawat

http://kavyawani.blogspot.com/