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रविवार, 18 अप्रैल 2010


हालात से

गुज़र कर

चटकती रूह

कडवी रही बहुत......


जिस्म को ज़ी

भर के सहलाती

रही चाँद की मीठी

सी परछाई....


-----आंच------

3 टिप्‍पणियां:

दिलीप ने कहा…

badi sundar rachna...
http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

भूतनाथ ने कहा…

अरे यह आंच तो बड़ी धीमी-धीमी है....बहुत प्यारी....बहुत मधुर भी....सच......

संजय भास्कर ने कहा…

आपकी रचनाओं में एक अलग अंदाज है,
rem