समर्थक

सोमवार, 5 जुलाई 2010

khwab

मेरा ही कोई
ख्वाब था शायद.,
"छत
किसी काई भरे
तालाब की तरह
पिघली-सी थी,
पंखा तैरता था
कभी डूबता था...

ख़्वाब टूटा तो
आँख
स्याह पानी से भरी थी,
मुस्कुराहट तैरती थी
तो कभी डूब जाती थी....

उफ़ ..!
ज़िन्दगी ख्वाबों में और
ख्वाब आँखों में घुल गए हैं.....

---aanch---


http://kavita.hindyugm.com/2010/06/khwab.html

7 टिप्‍पणियां:

स्वप्निल कुमार 'आतिश' ने कहा…

:)

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

ज़िन्दगी ख्वाबों में और
ख्वाब आँखों में घुल गए हैं....

सुन्दर....बहुत सुन्दर..

सम्वेदना के स्वर ने कहा…

नज़्म का जवाब नज़्म से न देने वादा किया है... इसलिए बस "बहुत सुंदर" कह रहा हूँ... बड़ी देर लगी आने में...

सम्वेदना के स्वर ने कहा…

meraa commnet kyon gaayab kar diyaa???

aanch ने कहा…

:)sab kuch yahin to hai :)

Avinash Chandra ने कहा…

ख़्वाब टूटा तो
आँख
स्याह पानी से भरी थी,

ye itna khubsurat hai ki...no comments :)

saanjh ने कहा…

is it a co-incidence that hamaare blogs ki template same hai. i swear maine aapka blog pehle nahin dekha tha...maine to apni template bhi khud select nahin ki. deep ne choose ki aur mujhe pasand aa gayi. ab dekha to aapki bhi same same...hmm ;)
sooooooo long, missed u

aur nazmein...? i cant comment on those...u kno it:)